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The Business Vault · @TheBusinessVault-p9h
Words
2,039
Runtime
9:44
Speaking pace
209wpm
Reading time
9min
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Opening (first 30 seconds)
इमेजिन कीजिए आप एक फाइव स्टार होटल में एंटर करते हैं। रूम की कीमत है ₹2000 प्रति नाईट। आप रूम बुक करते हैं, चेक इन करते हैं और सोचते हैं होटल ने आज मुझसे ₹20,000 कमा लिए। लेकिन अगर मैं आपसे कहूं कि यह ₹20,000 शायद होटल की सबसे इंटरेस्टिंग अर्निंग भी नहीं है। और इससे भी बड़ा सवाल अगर एक लग्जरी होटल बनाने में 100्स ऑन ऑफ करोड़ लग जाए, हर दिन 100्स ऑन ऑफ एंप्लाइजस काम करें, इलेक्ट्रिसिटी और मेंटेनेंस का खर्च चलता रहे। तो आखिर इतना पैसा इन्वेस्ट करने के बाद होटल [संगीत] प्रॉफिट कैसे बनाता है? इसका जवाब समझने के लिए
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इमेजिन कीजिए आप एक फाइव स्टार होटल में एंटर करते हैं। रूम की कीमत है ₹2000 प्रति नाईट। आप रूम बुक करते हैं, चेक इन करते हैं और सोचते हैं होटल ने आज मुझसे ₹20,000 कमा लिए। लेकिन अगर मैं आपसे कहूं कि यह ₹20,000 शायद होटल की सबसे इंटरेस्टिंग अर्निंग भी नहीं है। और इससे भी बड़ा सवाल अगर एक लग्जरी होटल बनाने में 100्स ऑन ऑफ करोड़ लग जाए, हर दिन 100्स ऑन ऑफ एंप्लाइजस काम करें, इलेक्ट्रिसिटी और मेंटेनेंस का खर्च चलता रहे। तो आखिर इतना पैसा इन्वेस्ट करने के बाद होटल [संगीत] प्रॉफिट कैसे बनाता है? इसका जवाब समझने के लिए एक होटल इमेजिन कीजिए। मान लीजिए इसका नाम है द रॉयल ग्रैंड। यह एक [संगीत] हाइपोथेटिकल फाइव स्टार होटल है जिसकी पूरी प्रॉपर्टी बनाने में लगभग ₹500 करोड़ की इन्वेस्टमेंट हुई है। इसके अंदर 300 रूम्स हैं। लोकेशन प्रीमियम है। लॉबी शानदार है। तीन रेस्टोरेंट्स हैं, [संगीत] एक स्पा है, एक स्विमिंग पूल है और एक बड़ा बैंकवेट हॉल है जहां वेडिंग्स और कॉर्पोरेट इवेंट्स होते हैं। अब होटल खुल चुका है और पहली रात 300 में से सिर्फ 210 रूम्स बिकते हैं। ऑक्यूुपेंसी है 70%। अब एक सवाल। बाकी 90 रूम्स का क्या? वे कमरे मौजूद हैं। उनकी क्लीनिंग हो चुकी है। इलेक्ट्रिसिटी रेडी है, स्टाफ रेडी है। लेकिन उस रात कोई उनमें सो नहीं रहा। होटल उन 90 रूम्स को कल दोबारा नहीं बेच सकता। आज की खाली रात हमेशा के लिए चली गई। यही होटल बिजनेस की पहली बड़ी समस्या है। होटल एक ऐसी चीज बेचता है जिसे स्टोर नहीं किया जा सकता। और इसलिए अब होटल को सिर्फ रूम्स भरने नहीं है। उसे [संगीत] सही प्राइस पर रूम्स भरने हैं। मान लीजिए द रॉयल ग्रैंड का एवरेज रूम रेट ₹00 है। 210 रूम्स बिके। तो उस रात होटल की ग्रॉस रूम रेवेन्यू ₹42 लाख हुई। ध्यान रखिए रेवेन्यू प्रॉफिट [संगीत] नहीं क्योंकि अभी इस ₹42 लाख में से होटल के असली खर्च निकलने बाकी हैं लेकिन इससे पहले कि हम खर्चों पर जाएं होटल को समझना होगा कि यह ₹2000 की कीमत तय कैसे हुई क्योंकि अगर होटल ₹10,000 चार्ज करे तो शायद ज्यादा रूम्स बिके। अगर ₹30,000 चार्ज करे तो शायद फ्यूअर रूम्स बिकें। [संगीत] तो सही प्राइस क्या है? यहीं आता है होटल रेवेन्यू मैनेजमेंट। होटल हर रात डिमांड को देखता है। सीजन कैसा है? सिटी में कोई बड़ा इवेंट है, वीकेंड है, टूरिस्ट सीजन है, बिजनेस ट्रेवल ज्यादा है, कंपेटर्स क्या चार्ज कर रहे हैं? और फिर रूम प्राइस एडजस्ट किया जाता है। यही है डायनामिक प्राइसिंग। और होटल [संगीत] इंडस्ट्री में एक इंपॉर्टेंट कैलकुलेशन होती है रेफ पर। रेवेन्यू पर अवेलेबल रूम। इसे बहुत सिंपल तरीके से समझिए। हमारे होटल में 300 रूम्स हैं। एवरेज रूम रेट ₹00 है। लेकिन सिर्फ 70% रूम्स बिके। तो हर अवेलेबल रूम के हिसाब से एवरेज रूम रेवेन्यू ₹14,000 बैठता है। यही रफली हमारा रेवे पीएआर है। मतलब होटल को सिर्फ यह नहीं देखना कि सोल्ड [संगीत] रूम्स कितने महंगे थे। उसे यह भी देखना है कि पूरी प्रॉपर्टी कितनी एफिशिएंटली रेवेन्यू जनरेट कर रही है और यहीं से होटल के लिए असली गेम शुरू होता है। क्योंकि अगर आप सोच रहे हैं कि होटल की पूरी अर्निंग उन 210 रूम्स से ₹42 लाख हैं तो आप अभी आधी कहानी देख रहे हैं। द रॉयल ग्रैंड में सुबह 210 गेस्ट्स उठते हैं और अब होटल के पास एक ओपोरर्चुनिटी है ब्रेकफास्ट फिर कॉफी, शायद लंच, शाम को ड्रिंक्स, डिनर, रूम सर्विस, स्पा। और अगर उसी दिन कोई वेडिंग चल रही है तो कहानी और [संगीत] बड़ी हो जाती है। मान लीजिए एक गेस्ट ने ₹00 का रूम लिया। उसने ₹2000 का ब्रेकफास्ट किया। ₹4000 का डिनर, ₹3,000 की रूम सर्विस और ₹5,000 का स्पा। अब उस गेस्ट की टोटल स्पेंडिंग ₹34,000 हो गई। लेकिन यहां भी एक इंपॉर्टेंट करेक्शन है। यह होटल का प्रॉफिट [संगीत] नहीं है। रेस्टोरेंट के फ़ूड की कॉस्ट है। स्टाफ की कॉस्ट है। एस्पा प्रोडक्ट्स और एंप्लाइजज़ की कॉस्ट [संगीत] है। टैक्सेस हो सकते हैं, बुकिंग कमीशंस हो सकती हैं और बाकी ऑपरेटिंग एक्सपेंसेस भी हैं। इसलिए फाइव स्टार होटल का लक्ष्य सिर्फ मोर स्पेंडिंग नहीं है। उसका लक्ष्य है प्रॉफिटेबल स्पेंडिंग और यही डिफरेंस होटल बिजनेस [संगीत] को इंटरेस्टिंग बनाता है। अब इमेजिन कीजिए उसी होटल में एक सैटरडे को वेडिंग है। 300 गेस्ट्स नहीं शायद 500 लोग इवेंट में आ गए। अब होटल सिर्फ रूम से पैसा नहीं बना रहा। बैंकवेट हॉल से रेवेन्यू, केटरिंग से रेवेन्यू, ड्रिंक्स से रेवेन्यू, गेस्ट रूम से रेवेन्यू, ब्रेकफास्ट से रेवेन्यू और अगले दिन भी वही गेस्ट होटल में स्पेंड कर सकते हैं। एक इवेंट और प्रॉपर्टी के कई डिपार्टमेंट्स एक्टिवेट [संगीत] हो गए। यही वजह है कि बड़े होटल्स सिर्फ अकोमोडेशन बिनेसेस नहीं होते। वे एक पूरा हॉस्पिटिटी इकोसिस्टम बनाते हैं। लेकिन यहां एक नई प्रॉब्लम आती है। इतना बड़ा होटल चलाने के लिए आखिर खर्च कितना होता है? क्योंकि ₹42 लाख रूम रेवेन्यू सुनने में बहुत इंप्रेसिव है। जब तक आपको यह याद नहीं आता कि होटल को हर [संगीत] दिन ऑपरेट भी करना है। हाउस कीपिंग को रूम्स क्लीन करने हैं। किचन को फूड प्रिपेयर करना है। इंजीनियरिंग टीम को बिल्डिंग चलानी है। सिक्योरिटी 24 घंटे 7 दिन मौजूद रहनी है। और होटल को कभी-कभी उस चीज पर भी पैसा खर्च करना पड़ता है जिसे गेस्ट देखता तक नहीं। जैसे एक विशाल एयर कंडीशनिंग सिस्टम, वाटर सिस्टम्स, बैकअप पावर, फायर सेफ्टी, ल्ड्री, टेक्नोलॉजी। यह सब होटल की लग्जरी एक्सपीरियंस का इनविज़िबल इंफ्रास्ट्रक्चर है और सबसे बड़ा रिकरिंग कॉस्ट अक्सर पीपल होते हैं क्योंकि फाइव स्टार होटल में स्टाफ सिर्फ एंप्लाइजज़ नहीं है। वे प्रोडक्ट का हिस्सा है। अगर गेस्ट को रूम में प्रॉब्लम होती है तो टेक्नोलॉजी उसे स्माइल नहीं दे सकती। अगर गेस्ट लेट नाइट खाना चाहता है तो कोई इंसान ऑर्डर प्रिपेयर करेगा। अगर कोई वीआईपी अराइवल है तो कोई पूरी एक्सपीरियंस कोऑर्डिनेट करेगा। यानी होटल जितना प्रीमियम बनता है उतना ही उसका ह्यूमन ऑपरेशन कॉम्प्लेक्स होता जाता है। और फिर आता है एक खर्च जिसे कोई गेस्ट देखकर नहीं सोचता। मेंटेनेंस लग्जरी होटल को पुराना दिखना अफोर्ड नहीं कर सकता। आज का प्रीमियम रूम 5 साल बाद आउटडेटेड लग सकता है। फर्नीचर बदलना पड़ सकता है। बाथरूम्स रनोवेट करने पड़ सकते हैं। मैट्रेसेस रिप्लेस करने पड़ सकते हैं। टेक्नोलॉजी अपग्रेड करनी पड़ सकती है। क्योंकि गेस्ट सिर्फ आज की लग्जरी के लिए पे कर रहा है। वह ऐसी लग्जरी एक्सपेक्ट कर रहा है जो आज भी प्रीमियम लगे। अब यहां से हमारे ₹500 करोड़ होटल की सबसे बड़ी प्रॉब्लम सामने आती है। इतनी बड़ी इन्वेस्टमेंट इतनी सारी ऑपरेटिंग कॉस्ट इतने सारे एम्प्लाइज और फिर भी रूम्स हर रात फुल नहीं होते। तो ओनर के पास एक सॉल्यूशन है ब्रांड लेकिन ब्रांड सिर्फ होटल के बाहर लगा हुआ लोगो नहीं है। इमेजिन कीजिए आपने ₹500 करोड़ की प्रॉपर्टी बना दी। लेकिन दुनिया में कोई आपको जानता [संगीत] ही नहीं। अब आपको कस्टमर्स कहां से मिलेंगे? आपको बुकिंग्स चाहिए, मार्केटिंग चाहिए, लॉयल्टी कस्टमर्स चाहिए, टेक्नोलॉजी चाहिए, रिजर्वेशन नेटवर्क [संगीत] चाहिए और सबसे इंपॉर्टेंट एक ऐसा नाम चाहिए जिस पर कस्टमर पहले से ट्रस्ट करता हो। यहीं पर हिल्टन, मैरियड जैसे बड़े होटल ग्रुप्स का बिजनेस मॉडल पावरफुल बनता है। हर प्रॉपर्टी को खुद ओन करना जरूरी नहीं। होटल इंडस्ट्री में फ्रेंचाइज़ और मैनेजमेंट एग्रीमेंट्स जैसे मॉडल्स का इस्तेमाल होता है। फ्रेंचाइज़ में ओनर को ब्रांड सिस्टम्स, स्टैंडर्ड्स और डिस्ट्रीब्यूशन जैसे रिसोर्सेज मिल सकते हैं। [संगीत] मैनेजमेंट कॉन्ट्रैक्ट में होटल का डे टू डे ऑपरेशन भी एक प्रोफेशनल होटल ऑपरेटर संभाल सकता है। दोनों मॉडल्स एक्सैक्टली सेम नहीं है। लेकिन बेसिक आईडिया पावरफुल है। प्रॉपर्टी कोई और ओन कर सकता है। जबकि ब्रांड अपनी एक्सपर्टाइज और सिस्टम से वैल्यू क्रिएट कर सकता है और बदले में ब्रांड फीस [संगीत] अर्न करता है। यही है होटल इंडस्ट्रीज एसेट लाइट स्ट्रेटजी का बड़ा फायदा। कंपनी को हर बार नई बिल्डिंग खरीदने के लिए 100्स ऑफ करोड़ लगाने की जरूरत नहीं। वह अपना सबसे वैल्यूएबल [संगीत] एसेट, ब्रांड और ऑपरेटिंग सिस्टम दूसरी प्रॉपर्टीज तक ले जा सकती है। लेकिन अब सोचिए अगर ब्रांड इतना पावरफुल है तो उसकी वैल्यू आखिर आती कहां से है? आप किसी अननोन होटल में ₹00 देने से पहले 10 बार [संगीत] सोच सकते हैं। लेकिन एक इंटरनेशनलली रिकॉग्नाइज्ड ब्रांड देखकर आप शायद जल्दी डिसीजन ले लें क्योंकि आप सिर्फ रूम नहीं खरीद रहे। आप अनसर्टेनिटी कम कर रहे हैं। आपको एक एक्सपेक्टेड लेवल की सर्विस मिलनी चाहिए। एक नोन बुकिंग एक्सपीरियंस, एक लॉयल्टी प्रोग्राम, एक फैमिलियर स्टैंडर्ड और यही ब्रांड ट्रस्ट कस्टमर के विलिंगनेस टू पे को इन्फ्लुएंस [संगीत] करता है। लेकिन अब होटल बिजनेस का सबसे डेंजरस एनिमी सामने आता है। डिमांड शॉक। 2020 में कोविड-19 पेंडेमिक ने दुनिया के ट्रैवल और हॉस्पिटिटी इंडस्ट्री को ऐसा झटका दिया जिसकी किसी ने सामान्य परिस्थितियों में कल्पना नहीं की थी। फ्लाइट्स बंद हुई, इंटरनेशनल ट्रैवल गिरा, बिजनेस ट्रिप्स कैंसिल हुई, इवेंट्स रुके और कई होटल्स में ऑक्यूुपेंसी बेहद लो लेवल्स तक पहुंच गई। लेकिन होटल की सबसे बड़ी प्रॉब्लम यह थी बिल्डिंग वहीं थी। लोन हो तो पेमेंट करनी थी। प्रॉपर्टी को मेंटेन करना था। सिक्योरिटी चाहिए थी। बेसिक ऑपरेशंस चाहिए थे। यानी रेवेन्यू कोलैप्स हो सकता है। लेकिन सारे कॉस्ट्स उसी स्पीड से डिसपीयर नहीं होते। और यही कारण है कि होटल बिजनेस बाहर से जितना ग्लैमरस दिखता है। अंदर से उतना ही कैपिटल इंटेंसिव और रिस्की हो सकता है। तो फिर ओनर इतना रिस्क क्यों लेता है? क्योंकि अगर प्रॉपर्टीज [संगीत] सही लोकेशन पर है, ब्रांड स्ट्रांग है, प्राइसिंग सही है। ऑन ऑपरेशंस एफिशिएंट है और होटल रूम्स के अलावा इवेंट्स, रेस्टोरेंट्स और अदर सर्विसेस से भी पैसा जनरेट करता है, तो एक ही प्रॉपर्टी कई रेवेन्यू इंजं्स चला सकती है। और यहीं हमारी ₹500 करोड़ वाली कहानी वापस आती है। मान लीजिए होटल की रूम्स से साल भर में करोड़ों का रेवेन्यू आता है। फिर रेस्टोरेंट्स कंट्रीब्यूट करते हैं। इवेंट्स कंट्रीब्यूट करते हैं। एस्पा और अदर सर्विज कंट्रीब्यूट करती हैं। लेकिन इन सबको जोड़ने के बाद भी ओनर के सामने आखिरी सवाल वही है। इन सब रेवेन्यू स्ट्रीम्स को चलाने में कितना खर्च हो रहा है? क्योंकि ₹100 करोड़ रेवेन्यू वाला होटल जरूरी नहीं कि ₹100 करोड़ कमाता [संगीत] हो। रेवेन्यू और प्रॉफिट के बीच एक बहुत लंबी दूरी होती है। टैक्सेस, कमीशंस, पेरोल, फ़ूड कॉस्ट, मेंटेनेंस, यूटिलिटीज़, मार्केटिंग, टेक्नोलॉजी, फाइनेंसिंग और प्रॉपर्टी को फ्यूचर में अपग्रेड करने के लिए कैपिटल, एक्सपेंडिचर इन सबके [संगीत] बाद जो बचता है, वही असली इकोनमिक प्राइस है। और शायद यही फाइव स्टार होटल बिजनेस की सबसे बड़ी मिसअंडरस्टैंडिंग है। बाहर से हमें सिर्फ ₹00 का रूम दिखता है। ओनर को दिखाई देता है। एक ₹500 करोड़ एसेट रेवेन्यू मैनेजर को दिखाई देता है। ऑक्यूुपेंसी और प्राइसिंग का इक्वेशन ऑपरेशंस टीम को दिखाई देता है। हर दिन का इनॉर्मस कॉस्ट स्ट्रक्चर ब्रांड को दिखाई देता है। एक ऐसा प्लेटफार्म जिससे फीस और लॉन्ग टर्म कस्टमर लॉयल्टी जनरेट की जा सकती है और कस्टमर को उसे बस एक शानदार राज चाहिए। यही इस पूरे बिजनेस [संगीत] का कंट्राडिक्शन है। कस्टमर के लिए होटल एक एक्सपीरियंस है। ओनर के लिए एक मैसिव इन्वेस्टमेंट है। ब्रांड के लिए एक स्केलेबल बिजनेस प्लेटफार्म है। और अगर तीनों की इकोनॉमिक्स एक साथ काम कर जाए तभी फाइव स्टार होटल वास्तव में प्रॉफिटेबल बनता है। इसलिए अगली बार जब आप किसी लग्जरी होटल की लॉबी में एंटर करें तो सिर्फ सैंडलियर मत देखिए। सोचिए उस लॉबी तक पहुंचने में कितनी कैपिटल लगी होगी। उस प्रॉपर्टी को हर दिन चलाने में कितना खर्च हो रहा होगा। उस रात कितने रूम्स खाली हैं? कितने गेस्ट रेस्टोरेंट में स्पेंड कर रहे हैं? कितने लोग इवेंट के लिए आए हैं? और सबसे इंपॉर्टेंट क्या उस पूरी लग्जरी [संगीत] मशीन से आखिर में पर्याप्त प्रॉफिट बच रहा है? क्योंकि फाइव स्टार होटल बिज़नेस का असली सीक्रेट ये नहीं है कि एक रूम ₹2000 में बिक सकता है। असली सीक्रेट यह है कि अ एक खाली रूम की कीमत जीरो हो सकती है लेकिन सही कस्टमर के साथ वही रूम एक पूरे इकोसिस्टम को एक्टिवेट कर सकता है। और शायद यही वजह है कि दुनिया के सबसे महंगे होटल्स सिर्फ रूम्स नहीं बनाते। वे ऐसी प्रॉपर्टीज बनाते हैं, जहां हर स्क्वायर मीटर का एक बिजनेस पर्पस होता है। जहां हर गेस्ट सिर्फ गेस्ट नहीं एक पोटेंशियल रेवेन्यू स्ट्रीम है और जहां लग्जरी सिर्फ खर्च नहीं होती। लग्जरी को केयरफुली इंजीनियर किया जाता है ताकि वही खर्च आखिर में बिज़नेस बन जाए। अब आप बताइए अगली वीडियो किस बिजनेस पर होनी चाहिए? अपना सजेशन कमेंट में जरूर दीजिए।
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